गणगौर

राजस्थान की समृद्ध सांस्कृतिक एवं सामाजिक परंपराओं में कई ऐसे त्यौहार प्रचलित हैं, जो विशेष रूप से यहीं मनाए जाते हैं। गणगौर उन्हीं त्यौहारों में से एक है। कुंआरी कन्याएं अच्छे पति की प्राप्ति के लिए और विवाहित स्त्रियां पति के स्वस्थ और दीर्घायु जीवन की कामना करती हुई सोलह श्रृंगार कर व्रत रखकर यह त्यौहार मनाती हैं। सामान्यत: गणगौर के त्यौहार मेँ शिव-पार्वती के रूप में ईसरजी और गणगौर की काष्ठ प्रतिमाओं का पूजन किया जाता है । मान्यता है कि शिव जी से विवाह के बाद जब देवी पार्वती पहली बार मायके आई थीं तब उनके आगमन की खुशी में स्त्रियां यह त्योहार मनाया था । इसीलिए नवविवाहित लडकियां अपना पहला गणगौर मायके मेँ ही मनाती है । यह त्योहार फाल्गुन पूर्णिमा (होली) के दूसरे दिन से शुरू हो जाता है और 18 दिनों तक चलता है। परिवारों में ईसरजी और गणगौर काष्ठ प्रतिमाएँ रखी जाती है । चैत्र कृष्ण प्रतिपदा से चैत्र शुक्ल तृतीया तक प्रतिदिन वे फूल-फल, दूब, पकवान व अंकुरित जौ से शिव-पार्वती की अर्चना करती हैं।

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Posted on April 12, 2011, in राजस्थान के पर्व एवं त्यौहार. Bookmark the permalink. Leave a comment.

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