लोक देवता पाबूजी

राजस्थान के प्राचीन लोक जीवन में कुछ ऐसे व्यक्तित्व हुए है जिन्होंने लोक कल्याण के लिए अपना जीवन तक दाँव लगा दिया और देवता के रूप में सदा के लिए अमर हो गए। इन लोक देवताओं में कुछ को पीर की संज्ञा दी गई है। एक जनश्रुति के अनुसार राजस्थान में पांच पीर हुए हैं, जिनके नाम पाबूजी, हड़बूजी, रामदेवजी, मंगलिया जी और मेहा जी है। इस जनश्रुति का दोहा इस प्रकार है- पाबू, हड़बू, रामदे, मांगलिया, मेहा। पांचो पीर पधारज्यों, गोगाजी जेहा॥ इन्हें ‘पंच पीर’ भी कहा जाता है। लोक देवता पाबूजी का जन्म संवत 1313 में जोधपुर जिले में फलौदी के पास कोलूमंड गाँव में हुआ था। इनके पिता का नाम धाँधल जी राठौड़ था। वे एक दुर्ग के दुर्गपति थे। पाबूजी का विवाह अमरकोट के सोढ़ा राणा सूरजमल की पुत्री के साथ तय हुआ। वीर पाबूजी राठौड़ ने अपने विवाह में फेरे लेते हुए सुना कि डाकू एक अबला देवल चारणी की गाएँ हरण कर ले जा रहे हैं। उन्होँने उस महिला को उसकी गायों की रक्षा का वचन दे रखा था। गायों के अपहरण की बात सुनते ही वे आधे फेरों के बीच ही उठ खड़े हुए तथा गायों की रक्षा करते हुए वीर-गति को प्राप्त हुए। इसी कारण पाबूजी को गायों, ऊँटों एवं अन्य पशुओं का रक्षक देवता भी कहा जाता हैं। इन्हें प्लेग रक्षक भी माना जाता हैँ। पशु के बीमार हो जाने पर ग्रामीण पाबूजी के नाम की तांती (एक धागा) पशु को बाँध कर मनौती माँगते हैँ। मान्यता है कि इससे पशुओं की बीमारी दूर हो जाती है। पाबूजी को लक्ष्मणजी का अवतार माना जाता है। इनकी प्रतिमा मेँ इन्हें भाला लिए अश्वरोही के रूप में अंकित किया जाता है। प्रतिवर्ष चैत्र अमावस्या को पाबूजी के मुख्य थान (मंदिर गाँव कोलूमण्ड) में विशाल मेला लगता है जहाँ भक्तगण हजारों की संख्या में आकर उन्हें श्रृद्धांजलि अर्पित करते हैं। पाबूजी के यशगान में पावड़े (गीत) गाये जाते हैं व मनौती पूर्ण होने पर फड़ भी बाँची जाती है। पाबूजी की फड़ पूरे राजस्थान में विख्यात है जिसे भोपे बाँचते हैँ। ये भोपे विशेषकर थोरी जाति के होते हैं। फड़ कपड़े पर पाबूजी के जीवन प्रसंगों के चित्रों से युक्त एक पेंटिंग होती है। भोपे पाबूजी के जीवन कथा को इन चित्रों के माध्यम से कहते हैं और गीत भी गाते हैं। इन भोपों के साथ एक स्त्री भी होती है, जो भोपे के गीतोच्चारण के बाद सुर में सुर मिलाकर पाबूजी की जीवन लीलाओं के गीत गाती है। फड़ के सामने ये नृत्य भी करते हैं। ये गीत रावण हत्था पर गाये जाते हैं जो सारंगीनुमा वाद्य यन्त्र होता है। पाबूजी की फड़ लगभग 30 फीट लम्बी तथा 5 फीट चौड़ी होती है। इस फड़ को एक बांस में लपेट कर रखा जाता है। पाबूजी के अलावा अन्य लोकप्रिय फड़ ‘देवनारायण जी की फड़’ होती है।

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Posted on April 12, 2011, in पाबूजी, राजस्थान के लोक देवता. Bookmark the permalink. Leave a comment.

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