हिन्दी साहित्य (HINDI SAHITYA)

हिन्दी साहित्य (HINDI SAHITYA)
द्वितीय श्रेणी अध्यापक परीक्षा के लिए विशेष
(RPSC II GRED TEACHER EXAM)
Part -2
101 सांग रूपक कहते है – जब उपमेय पर उपमान का आरोप किया जाए साथ ही उपमान के अंगों का भी उपमेय के अंगों पर आरोप किया जाए।
102 सांग रूपक के उदाहरण है –
– उद्यो ! मेरी ह्दयतल था एक उद्यान न्यारा, शोभा देती अमिल उसमें कल्पना क्यारियां थी
– न्यारे-न्यारे कुसुम कितने भाव के थे अनेको, उत्साह के विपुल विटपी मुग्धकारी महा थे

103 जब केवल उपमान का आरोप उपमेय पर किया जाए तो रूपक होगा – निरंग रूपक
104 निरंग रूपक के उदाहण है –
– चरन-कमल मृदु मंजु तुम्हारे
– हरि मुख मुदुल मयंक

105 परम्परित रूपक है – परम्परित में दो रूपक होते है। एक रूपक दूसरे से परम्पराबध्द होता है।
106 परम्परित रूपक के उदाहरण है –
– आशा मेरे ह्दय मरू की मंजु मंदाकिनी है
– रवि कुल-कैरव विधु रघुनायक
– उदयो ब्रज नभ आई यह हरि मुख मधुर मयंक
107 जब सादृश्य के कारण उपमेय में उपमान का भ्रम हो तो अलंकार होगा – भ्रांतिमान अलंकार
108 भ्रांतिमान अलंकार के उदाहरण है –
– जानि श्याम को स्याम घन नाचि उठे वन मोर
– ओस बिंदु चुग रही हंसिनी मोती उनको जान
– मनि-सुख मेली ठारि कपि देही
– पट पोंछति चूनो समुझि नारी निपट अयानि
109 संदेह अलंकार की परिभाषा है – जब सादृश्य के कारण एक वस्तु में अनेकन्य वस्तु के होने की संभावना पडे अौर निश्चय न हो पाए तब संदेह अलंकार होता है।
110 संदेह अलंकार की पहचान के वाचक शब्द है – कि, किंधो, या, अथवा आदि
111 संदेह अलंकार के उदाहरण है –
– हे सखी! यह हरि का मुख है या चंद्रमा उगा है
– कहहि सप्रेम एक-एक वाही, राम लखन सखी हो हिं कि नाहीं
112 असंगति अलंकार है – जब साथ रहने वाली वस्तुओं को अलग-अलग स्थानों में रखा जाए।

113 असंगति अलंकार के उदाहरण है –
– पायन की सुधि भूल गयी, अकुलाय महावर आंखिन दीनो
– आये जीवन देन घन, लागे जीवन लेन
114 विभावना अलंकार के उदाहरण है –
– बिनु पद चले, सुने बिनु काना
– प्यास मिटी पानी बिना, मोहन को मुख देखि
– सहस सवार जिते सवा लेकर सौ असवार
– तेज छत्र धारिन हूं, असहन ताप करंत
115 सीतहहि लै दसकंध गयो, पै गयो है विचारो समुंदर बांध्यो में अलंकार है – असंगति
116 लागत लाज लगाम नहिं, नैक न गहत मरो, होत तोहि लखि बाल के दृग तुरंग मुंह जोर में अलंकार है – रूपक

117 घिर रहे थे घुंघराले बाल, अंस अवलम्बित मुख के पास नील घन शावक से सुकुमार सुधा भरने को विधु के पास में अलंकार होगा – उत्प्रेक्षा

118 जब उपमेय और उपमान में भिन्नता होने पर भी समानता स्थापित की जाए तब अलंकार होगा – उपमा
119 उपमेय पर उपमान का निषेध रहित आरोप होने पर अलंकार होगा – रूपक
120 लता भवन तें प्रकट भे, तेहि औसर दोउ भाई, निकले जनु जुग विमल विधु, जलद पटल बिलगाए में अलंकार है – उत्प्रेक्षा
121 सादृश्यस के कारण उपमेय में उपमान का संशय हो वहां अलंकार होगा – संदेह
122 उत्प्रेक्षा अलंकार का लक्षण है – उपमेय में उपमान की कल्पना
123 अलंकार व लक्षणों को सुमेलित कीजिए –
– यमक – भिन्न अर्थ वाले वर्ण समुदाय की क्रमश: आवृति
– श्लेष – एक ही शब्द में अनेक अर्थो का अभिधान
– असंगति – कारण व कार्य के निरंतर सम्बन्ध के परित्याग के साथ विरोध का आभास
– विभावना – प्रसिध्द कारण के अभाव में कार्योत्पति का चमत्कारपूर्ण वर्णन

124 सादृश्य के कारण उपमेय को निश्चयपूर्वक उपमान समझ लिया जाए तब कौनसा अलंकार होगा – भ्रांतिमान
125 जड़ प्रकृति के सजीव चित्रण के लिए छायावादी कवियों ने किस अलंकार का बहुतायत में प्रयोग किया – मानवीकरण
126 बीती विभावरी जाग री, अम्बर पनघट में डूबो रही तारा घट उषा नागरी में अलंकार है – रूपक और मानवीकरण
127 ऊंचे घोर मंदर के अंदर रहनवारी, ऊंचे घोर मंदर के अंदर रहाती है में अलंकार है – यमक
128 यों-यों बुडे स्याम रंग, त्यों-त्यों उवल होय में अलंकार है – विरोधाभास
129 वह इष्टदेव के मंदिर की पूजा सी, वह दीपशिख सी शांत भाव में लीन में अलंकार है – उपमा
130 भ्रांतिमान, विरोधाभास, विभावना व श्लेष में अर्थालंकार नहीं है – श्लेष
131 जहां काव्य में चमत्कार अर्थ पर आश्रित होता है, वहां अलंकार होगा – अर्थालंकार
132 सोहत ओढे पीत पट, स्याम सलोने गात, मनो नीलमनि सैल पर आतपपरयो प्रभात में अलंकार है – उत्प्रेक्षा
133 पानी केरा बुदबुदा अस मानुस की जात में अलंकार है- उपमा
134 धीरे-धीरे हिम आच्छादन हटने लगा धरातल से, जगी वनस्पतियां अलसाइ, मुख धोती शीतल जल से में अलंकार होगा – 
मानवीकरण
135 बढत-बढत सम्पति सलिल, मन सरोज बढ जाए, घटत-घटत फिर ना घटे बरू समूल कुम्हिलाय में अलंकार है – रूपक
136 इस काल मारे क्रोध के तनु कांपने उनका लगा, मानो हवा के जोर से सोता हुआ सागर जगा में अलंकार है – उत्प्रेक्षा
137 जानि स्याम घनश्याम को नाचि उठे वन मोर में अलंकार है – भ्रांतिमान
138 मुनि तापस जिनते दुख लहही ते नरेश बिनु पावक दहही में अलंकार होगा – विभावना
139 सारी बिच नारी है कि नारी बीच सारी है, सारी ही की नारी है कि नारी ही की सारी है में अलंकार है – संदेह
140 उन्नत हिमालय से धवल यह सुरसरी यों टूटती मानो पयोधर से धरा के दुग्ध धारा छुटती में अलंकार होगा – उत्प्रेक्षा
141 जय-जय जय गिरिराज किशोरी, जय महेश मुख चंद्र चकोरी में अलंकार है – रूपक
142 सरद सरोरूह नैन, तुलसी भरे सनेह जल में अलंकार है- रूपक
143 है बिखेर देती वसुंधरा, मोती सबके सोने पर, रवि बटोर लेता है उनको सदा सवेरा होने पर में अलंकार है – मानवीकरण
144 बिनु पद चलै, सुने बिनु काना, कर बिनु कर्म करै विधि नाना में अलंकार है – विभावना
145 सरद सरोरूह नैन, तुलसी भरे सनेह जल में अलंकार है – रूपक
146 पीपरपात-सरिस मन डोला में अलंकार है – यमक
147 रहिमन जो गति दीप की कुल कपूत गति सोय, बारे उजियिारे लगे बढे अंधेरो होय में अलंकार होगा – श्लेष
148 मेखलाकार पर्वत अपार, अपने सहस्त्र दृग सुमन फाड, अवलोक रहा था बार-बार नीचे जल में निज महाकार में अलंकार दृष्टिगत होता है – रूपक
149 नील परिधान बीच सुकुमार, खुल रहा मृदुल अधखुला अंग, खिला हो यों बिजली का फूल, मेघ वन बीच गुलाबी रंग में अलंकार है – उत्प्रेक्षा व रूपक

150 निदंक नियरे राखिये, आंगन कुटी छवाय, बिनु पानी साबुन बिना, निरमल करत सुभाय में अलंकार है – विभावना
151 या मुरली मुरलीधर की, अधरानधरी अधरा न धरोंगी में अलंकार है – यमक
152 तुलसी सुरेश-चाप, कैधों दामिनी कलाप, कैधो चली मेरू ते कृसानु सरि भारी है में अलंकार है – संदेह
153 धनि सूखे भरे भादो मांहा, अबहु न आये सींचन नाहा में अलंकार है – विरोधाभास
154 कपि करि हृदय विचार दीन्हि मुद्रिका डारि तब जानि असोक अंगार सीय हरिष उठि कर गह्यो में अलंकार है – भ्रांतिमान
155 कहते हुए यो पार्थ के दो बूंद, आंसू गिर पडे, मानो हुए दो सीपियों से व्यक्त दो मोती बडे में अलंकार है – उत्प्रेक्षा
156 भजन कह्यो तासो भयो, भयो न एकौ बार, दूरि भजन जासों कह्यो, सौ तै भयों गंवार में अलंकार है – यमक
157 लोचन सारथ करत है, तिल उपजावत नेह में अलंकार है – श्लेष
158 धीरे-धीरे संशय से उठ, बढ अपयश से शीघ्र अछोर, नभ के उर में उमड मोह से फैल लालसा से निशि भोर में अलंकार है – उपमा
159 उपमा के वाचक शब्द है – समान, सम, सा, से सी आदि
160 उत्प्रेक्षा के वाचक शब्द है – मनु, मानो, जनु, जनहू, जानो, मनहु आदि
161 रूपक के वाचक शब्द है – कोई भी नहीं इसमें उपमेय और उपमान होते है।
162 जहां कारण एक स्थान पर तथा कार्य अन्य स्थान पर वर्णित किया जाए वहां अलंकार होता है- असंगति
163 संदेह अलंकार के वाचक शब्द है = किधों, कैधों, या, अथवा
छन्द (ष्ट॥्हृष्ठ)

164 गणों की संख्या होती है – आठ (य मा ता रा ज भा न स ल ग म)
165 गण में कितने वर्ण होते है – तीन गुरु (स्स्स्)
166 रोला और उल्लाला के संयोग से बनने वाला छंद है – छप्पय
167 वर्ण, मात्रा, गति, यति के नियमों से नियंत्रित रचना कहलाती है – छंद
168 तीन वर्णो का समूह कहलाता है – गण
169 किस गण में तीनों वर्ण गुरु होते है – मगण
170 किस गण में तीनों वर्ण लघु होते है – नगण
171 पात भरी सहरी सकल सुत बारे-बारे। किस छंद का उदाहरण है – कवित्त का
172 मात्रिक छंद कहते है – मात्रिक छंद में एक मात्रा, दो मात्रा या संयुक्ताक्षर के आधार पर चरणों में मात्रा की गणना की जाती है। मात्रा संख्या का विधान होने से इन्हें मात्रिक छंद कहते है।
173 वर्णिक छंद की परिभाषा है – वर्णिक छंद में वर्णो की गणना होतीी है इसके लिए गण विधान रहता है। चरण में गणों के अनुसार वर्ण रखे जाते है उसी के अनुसार यति-गति रखी जाती है।

174 मात्रिक सम छंद है – तोमर, चौपई, चौपाई, शृंगार, रोला, रूपमाला, गीतिका, हरिगीतिका, सोरठाा, उल्लाला
175 मात्रिक विषम छंद है- कुण्डलिया, दोहा, रोला, छप्पय
176 वर्णिक सम छंद है- इंद्रवज्रा, उपेन्द्र वज्रा, उपजाति, वंशस्थ, भुजंग प्रयात, तोटक, दु्रतविलम्बित, वसंततिलका, शिखरणी, मंदाक्रांता, मतगयंद, मालती

177 ‘किसको पुकारे, यहां रोकर अरण्य बीच, चाहे जो करो शरण्य शरण तिहारे है’ में छंद है – कवित्त
178 दिवस का अवसान समीप था। यह किस चरण का छंद है – दु्रत विलम्बित
179 कवित्त छंद के प्रत्येक चरण में वर्णो की संख्या होती है – 31
180 हरिगीतिका छंद के प्रत्येक चरण में मात्राएं होती है – 28 तथा अंत में एक लघु एक गुरु
181 दिवस एक प्रभंजन का हुआ। अति प्रकोप घटा नभ में घिरी। किस वर्णिक छंद से समबन्धित है – दुतविलम्बित
182 पदकमल धोई चढाई नाव न नाथ उतराई चहों। किस छंद से सम्बन्धित है – सवैया
183 दोहा छंद के विषम चरणों की मात्राएं होती है- 13-13
184 छंद शास्त्र में यति कहते है – लय का अनुगमन करने वाले विरामों को
185 छंद शास्त्र में गति कहते है- लय के अनुसार प्रवाह का निर्वाह करना
186 छंद शास्त्र में गति क्यों आवश्यक है- मात्रिक छंदों में चरण की मात्राओं की सही गणना का ध्यान रखने के लिए।
187 किस छंद के प्रत्येक चरण में क्रमश: एक नगण, दो भगण और एक रगण होता है और प्रत्येक चरण में 12 वर्ण होते है- दुतविलम्बित छंद में (न भा भ रा एवं 12 वर्ण)
188 दु्रतविलम्बित छंद के उदाहरण है –
– प्रबल जो तुम्हे में पुरूषार्थ हो, सुलभ कौन तुम्हे न पदार्थ हो
प्रगति के पथ में विचरो उठो। भुवन में सुख-शांति भरो उठो
– दिवस का अवसान समीप था, गगन कुछ लोहित हो चला
189 हरिगीतिका छंद का परिचय है – यह मात्रिक छंद है। प्रत्येक चरण में कुल 28 मात्रा। 16-12 पर यति। चरणांत में एक लघु तथा एक गुरु वर्ण होना आवश्यक
190 हरिगीतिका के उदाहरण है –
– जो चाहता संसार में कुछ मान औ सम्मान है, उसके लिए इस मंत्र से बढ कर न और विधान है
-जिसको न निज गौरव तथा निज देश का अभिमान है, वह नर नहीं नर पशु निरा है और मृतक समान है।
191 कवित्त छंद की परिभाषा हे – यह वर्णिक मुक्तक छंद है। इसमें केवल वर्णो की संख्या निश्चित रहती है। प्रत्येक चरण में 31 वर्ण होते है तथा 16 व 15 वर्णो पर यति होती है। इसे मनहरण कवित्त छंद भी कहते है।
192 मनहरण कवित्त या धनाक्षरी के उदाहरण है –
– पात भरी सहरी, सकल सुत बोर-बोर, केवट की जाति, कुछु बेद ना पढाइहों
193 सवैया छंद का उदाहरण है –
– पदकमल धोई चढाई नाव न नाथ उतराई चहौं।
194 दोहा छंद के लक्षण है – यह मात्रिक छंद है। इसमें विषम चरणों में 13-13 मात्राएं तथा सम चरण में 11-11 मात्राएं होती है। विषम चरण के अंत में जगण (ढ्ढ स् ढ्ढ) न रहे। सम चरण के अंत में लघु होता है।
195 दोहा छंद का उदाहरण है = नहीं पराग नहिं मधुर मधु,नहि विकास इही काल
– मानस मंदिर में सती, पति की प्रतिमा थाप
जलती सी उस विरह में, बनी आरती आप
196 बत्तीस से अधिक मात्राओं के और छब्बीस से अधिक वर्णो के छंद कहलाते है – दण्डक
197 छंद की प्रत्येक पंक्ति कहलाती है – चरण
198 चारों चरणों में समान मात्राओं वाले छंद को कहते है – मात्रिक सम छंद
199 छंद में पंक्ति का पहला व तीसरा चरण कहलाता है – विषम
200 छंद में पंक्ति का दूसरा और चौथा चरण कहलाता है – सम

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Posted on April 12, 2011, in द्वितीय श्रेणी अध्यापक परीक्षा हिन्दी साहित्य. Bookmark the permalink. Leave a comment.

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